मुंबई। हिंदी और मराठी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। 8 अक्टूबर 2026 की सुबह गोवा के डोना पाउला स्थित अपने आवास पर उनकी तबीयत बिगड़ गई। उन्हें बेहोशी की हालत में अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके। अस्पताल की ओर से बताया गया कि उन्हें कार्डियक अरेस्ट आया था और करीब 45 मिनट तक उन्हें बचाने की कोशिश की गई।
नाना पाटेकर के निधन की खबर सामने आते ही फिल्म जगत और उनके करोड़ों प्रशंसकों के बीच शोक की लहर दौड़ गई। अपने कई दशकों लंबे फिल्मी करियर में नाना पाटेकर ने ऐसे किरदार निभाए, जिन्हें दर्शक आज भी याद करते हैं। उनकी खास पहचान उनकी बुलंद आवाज, चेहरे के भाव, संवाद बोलने के अंदाज और किरदार में पूरी तरह उतर जाने की क्षमता रही।
तिरंगा में था नाना पाटेकर का दमदार अंदाज
नाना पाटेकर के करियर की चर्चित फिल्मों में ‘तिरंगा’ का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। 1993 में आई इस फिल्म में उन्होंने शिवाजी राव वाघमारे का किरदार निभाया था। फिल्म में राजकुमार के साथ उनकी जोड़ी और दमदार संवाद अदायगी दर्शकों को खूब पसंद आई।
‘तिरंगा’ में नाना पाटेकर का किरदार देशभक्ति, साहस और जुनून से भरा हुआ था। इस फिल्म ने नाना की उस छवि को मजबूत किया, जिसमें वह सिर्फ अभिनय नहीं करते थे, बल्कि अपने किरदार को पर्दे पर जीवंत कर देते थे।
क्रांतिवीर ने बना दिया अभिनय का अलग मुकाम
नाना पाटेकर के करियर की सबसे यादगार फिल्मों में ‘क्रांतिवीर’ भी शामिल है। 1994 में रिलीज हुई इस फिल्म में उन्होंने प्रताप नारायण तिलक का किरदार निभाया था। फिल्म में उनके अभिनय को दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने खूब सराहा।
‘क्रांतिवीर’ के लिए नाना पाटेकर को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी संवाद अदायगी और गुस्से से लेकर भावुक दृश्यों तक की अदाकारी ने इस फिल्म के किरदार को अमर बना दिया।
उनके कई संवाद आज भी सोशल मीडिया और दर्शकों के बीच चर्चा में रहते हैं। ‘साला ये दुख काहे खत्म नहीं होता बे…’ जैसे संवादों ने नाना पाटेकर की अलग पहचान बनाई।
परिंदा से शुरू हुआ दमदार सफर
नाना पाटेकर ने हिंदी सिनेमा में कई अलग-अलग तरह के किरदार निभाए, लेकिन ‘परिंदा’ ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई। 1989 में आई इस फिल्म में उनके अभिनय की जमकर सराहना हुई और उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तथा फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
इसके बाद नाना पाटेकर ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने एक के बाद एक ऐसी फिल्मों में काम किया, जिनमें उनके अभिनय की अलग छाप देखने को मिली।
अग्निसाक्षी और खामोशी में भी दिखा अभिनय का अलग रंग
‘अग्निसाक्षी’ में नाना पाटेकर ने एक बेहद गंभीर और चुनौतीपूर्ण किरदार निभाया। इस फिल्म के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
वहीं ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ में उनका अभिनय बिल्कुल अलग अंदाज में सामने आया। गंभीर भूमिकाओं से लेकर भावनात्मक किरदारों तक नाना पाटेकर हर भूमिका में खुद को ढालने के लिए जाने जाते थे।
अब तक छप्पन में पुलिस अधिकारी के किरदार ने मचाई छाप
‘अब तक छप्पन’ में नाना पाटेकर ने पुलिस अधिकारी साधु आगाशे का किरदार निभाया। फिल्म में उनके सख्त और बेबाक अंदाज ने दर्शकों के बीच जबरदस्त प्रभाव छोड़ा।
पुलिस अधिकारी के किरदार में उनका अंदाज इतना प्रभावी रहा कि ‘अब तक छप्पन’ को नाना पाटेकर की यादगार फिल्मों में गिना जाने लगा।
वेलकम के उदय शेट्टी ने बदली तस्वीर
नाना पाटेकर सिर्फ गंभीर और गुस्सैल किरदारों के लिए ही नहीं जाने गए। ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी के किरदार ने उनके अभिनय का एक बिल्कुल अलग रंग दर्शकों के सामने रखा।
‘वेलकम’ में अनिल कपूर के साथ उनकी कॉमेडी टाइमिंग ने दर्शकों को खूब हंसाया। फिल्म में उदय शेट्टी के रूप में नाना पाटेकर का अंदाज इतना लोकप्रिय हुआ कि यह किरदार उनकी पहचान का हिस्सा बन गया।
‘अपुन इधरिच है’ जैसे छोटे-छोटे संवादों को जिस अंदाज में नाना पाटेकर ने पर्दे पर पेश किया, वह उनके अभिनय की खासियत बन गया।
अभिनेता ही नहीं, निर्देशक भी थे नाना पाटेकर
नाना पाटेकर सिर्फ एक बेहतरीन अभिनेता नहीं थे, बल्कि उन्होंने निर्देशन में भी हाथ आजमाया। 1991 में आई ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का निर्देशन उन्होंने किया था। फिल्म की कहानी और सेना से जुड़े विषय पर उनकी पकड़ ने उनके व्यक्तित्व के एक अलग पहलू को सामने रखा।
मराठी और हिंदी सिनेमा दोनों में बनाई पहचान
नाना पाटेकर का योगदान सिर्फ हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं था। उन्होंने मराठी रंगमंच और सिनेमा में भी महत्वपूर्ण काम किया। ‘नटसम्राट’, ‘आपला मानूस’ और कई अन्य मराठी फिल्मों में उनके अभिनय को सराहा गया।
उनका अभिनय किसी एक शैली तक सीमित नहीं था। एक तरफ वह ‘क्रांतिवीर’ और ‘तिरंगा’ जैसी फिल्मों में गंभीर और आक्रामक किरदार निभाते नजर आए, तो दूसरी तरफ ‘वेलकम’ जैसी फिल्म में उनकी कॉमेडी ने दर्शकों को खूब मनोरंजन दिया।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से पद्म श्री तक
नाना पाटेकर को उनके शानदार अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सहित कई बड़े सम्मान मिले। वर्ष 2013 में उन्हें भारत सरकार ने पद्म श्री से सम्मानित किया था।
फिल्मी पर्दे पर उनकी आवाज और अंदाज की अलग पहचान थी। वह उन कलाकारों में शामिल थे, जिनके आने मात्र से किसी दृश्य का प्रभाव बदल जाता था।
नाना पाटेकर का जाना सिनेमा के लिए बड़ी क्षति
नाना पाटेकर का निधन सिर्फ एक अभिनेता का जाना नहीं है, बल्कि भारतीय सिनेमा के एक ऐसे दौर का अंत है, जिसमें अभिनय के लिए किसी बड़े स्टारडम की जरूरत नहीं थी। उनकी आवाज, आंखों के भाव और संवाद बोलने का अंदाज ही उनकी सबसे बड़ी ताकत था।
‘तिरंगा’ का शिवाजी राव वाघमारे हो, ‘क्रांतिवीर’ का प्रताप नारायण तिलक, ‘अब तक छप्पन’ का साधु आगाशे या फिर ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी—नाना पाटेकर ने हर किरदार को अपनी अलग पहचान दी।
पर्दे पर उनका तेवर अब दिखाई नहीं देगा, लेकिन उनके किरदार, फिल्में और संवाद आने वाली पीढ़ियों तक याद किए जाते रहेंगे।
नाना पाटेकर के निधन से भारतीय सिनेमा ने एक ऐसा कलाकार खो दिया है, जिसकी जगह भरना आसान नहीं होगा। पर्दे का यह दमदार सितारा अब हमेशा के लिए खामोश हो गया, लेकिन उनकी आवाज और अभिनय की गूंज दर्शकों के दिलों में लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी।






