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गावां के पटना में अंग्रेज के जमानों से हो रही है काली पूजा, दीपावली के दूसरे दिन लगता है भव्य मेला

गावां : प्रखंड स्थित पटना और चरकी में काली पूजा की तैयारी धूमधाम से चल रही है। पूजा को लेकर कारीगरों द्वारा मां काली को अंतिम रूप दिया जा रहा है। बता दें कि पटना में काली पूजा अंग्रेजों के जमाने से होते आ रहा है। यहां पूजा का प्रारंभ टिकैत मेदिनी नारायण सिंह के

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By SamridhSamachar Desk Nov 2, 2021 Nov 2 38 Views
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गावां : प्रखंड स्थित पटना और चरकी में काली पूजा की तैयारी धूमधाम से चल रही है। पूजा को लेकर कारीगरों द्वारा मां काली को अंतिम रूप दिया जा रहा है। बता दें कि पटना में काली पूजा अंग्रेजों के जमाने से होते आ रहा है। यहां पूजा का प्रारंभ टिकैत मेदिनी नारायण सिंह के द्वारा किया गया था।

 

बताया जाता है कि टिकैत मेदिनी सिंह निःसंतान थे। कई पुत्रों का जन्म हुआ, लेकिन जन्म के उपरांत उनकी मृत्यु हो जाती थी। बाद में उन्होंने कोलकाता से मां दक्षिणेश्वर काली को लाकर उनकी स्थापना की व भक्ति भाव से अराधना करने लगे। बाद में उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। पुत्र प्राप्ति के बाद कार्तिक मास की अमावस्या दीपावली के अवसर पर काली की प्रतिमा का निर्माण करवाकर धूमधाम से पूजा अर्चना करने लगे। उनके द्वारा पटना चौक पर काली व देवी के मंदिर का निर्माण करवाया गया। इस समय यहां टिकैत वंश की पांचवीं पीढ़ी के लोग यहां निवास कर रहे हैं व आज भी पूजन आदि कार्यों में बढ़चढ़ कर भाग लेते हैं।

 

उनके वंशज बाबूमणी सिंह उर्फ हरिनारायण सिंह आज भी पूजन के समय पुजारी के रूप में पूजन में बैठते हैं। बता दें कि यहां वर्तमान समय में ग्रामीणों के सहयोग से पूजा होती है। प्रारम्भ में कई वर्षों तक टिकैत की आने वाली पीढ़ी क्रमशः टिकैत कटि सिंह व टिकैत मसुदन सिंह आदि के द्वारा निजी खर्च पर पूजन का आयोजन किया जाता था। बाद में जमींदारी प्रथा की समाप्ति के बाद ग्रामीणों के सहयोग से पूजन का आयोजन होने लगा।

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इस समय यहां के ग्रामीणों के सहयोग से यहां प्रतिमा निर्माण कर धूमधाम से पूजन का आयोजन किया जाता है एवं दीपावली के दूसरे दिन भव्य मेले का भी आयोजन होता है। मंदिर के जीर्णशीर्ण होने के बाद ग्रामीणों द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया। वर्तमान में उक्त स्थल पर विशाल राधा कृष्ण के मंदिर का भी निर्माण ग्रामीणों के सहयोग से करवाया जा रहा है। वर्ष में एक बार यहां अखंड कीर्तन का आयोजन भी ग्रामीणों द्वारा किया जाता है।

यहां बलि पूजन की है परंपरा

पूजा समिति के दरोगी स्वर्णकार, बासो यादव और लखन महतो आदि ने कहा कि पूर्व में यहां भैंसों की बलि दी जाती थी, लेकिन छठ के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कार्तिक में कुष्मांड की बलि दी जाती है। वहीं चैत्र व अश्विन नवरात्र के अवसर पर बकरों की बलि दी जाती है। उक्त स्थल क्षेत्र में आस्था का केन्द्र है। यहां पूजा के दौरान प्रखंड भर के श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है।

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