गिरिडीह। नाम बड़ा, दावा बड़ा और अब सवाल भी बड़ा। मंगलवार देर शाम फिजिक्स वाला विद्यापीठ पाठशाला में उस वक्त हंगामे की स्थिति बन गई, जब कई अभिभावक संस्थान पहुंचे और कथित तौर पर बिना स्पष्ट सहमति लोन शुरू किए जाने तथा तय फीस से ज्यादा रकम लिए जाने के आरोप लगाते हुए जमकर विरोध किया। अभिभावकों और संस्थान के कर्मचारियों के बीच तीखी नोकझोंक हुई और काफी देर तक परिसर में हंगामा चलता रहा।
एडमिशन के लिए बनाया जाता है दबाव
अभिभावकों का आरोप है कि बच्चों के स्कूल या अन्य जगहों से मोबाइल नंबर हासिल कर संस्थान के काउंसलर लगातार संपर्क करते हैं और एडमिशन के लिए दबाव बनाया जाता है। आरोप है कि फोन और संपर्क तक मामला सीमित नहीं रहता, बल्कि कई बार काउंसलर अभिभावकों के घर तक पहुंच जाते हैं। वहां बच्चों के भविष्य और पढ़ाई का हवाला देकर तरह-तरह की बातें समझाते हुए नामांकन के लिए दबाव बनाए जाने का दावा अभिभावकों ने किया है।
विवाद का सबसे गंभीर पहलू अब कथित लोन प्रक्रिया को लेकर सामने आया है।
एक अभिभावक ने बताया कि कक्षा 9वीं और 10वीं के लिए 40 हजार रुपये फीस तय हुई थी। उनका आरोप है कि बाद में रजिस्ट्रेशन या अन्य प्रक्रिया के नाम पर मोबाइल पर OTP लिया गया और इसी के बाद कथित तौर पर लोन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। अभिभावक के मुताबिक 40 हजार रुपये की तय फीस की जगह कुल देनदारी बढ़कर करीब 59 हजार रुपये हो गई।
अब सवाल सीधा है—40 हजार की तय फीस 59 हजार कैसे हो गई?
क्या OTP लेने से पहले अभिभावक को साफ-साफ बताया गया था कि यह केवल रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोन से जुड़ी प्रक्रिया है? क्या उन्हें कुल 59 हजार रुपये की देनदारी और उसकी पूरी शर्तों की जानकारी दी गई थी? और अगर जानकारी दी गई थी, तो उसकी लिखित सहमति और दस्तावेज अभिभावकों को क्यों न दिखाए जाएं?
कुछ अभिभावकों का दावा है कि उन्होंने किसी लोन के लिए अलग से आवेदन नहीं किया था, फिर भी बैंक से जुड़े भुगतान उनके खातों से कट रहे हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ रकम का नहीं, बल्कि सहमति की प्रक्रिया का भी है।
एक अन्य अभिभावक ने आरोप लगाया कि बच्चे ने संस्थान की पढ़ाई छोड़ दी थी, लेकिन इसके बावजूद खाते से भुगतान कटता रहा। उनका दावा है कि आर्थिक दबाव की स्थिति ऐसी बनी कि बच्चे को दोबारा पढ़ाई के लिए संस्थान भेजना पड़ा।
उपभोक्ता न्यायालय का खटखटाया दरवाजा
फीस को लेकर भी अभिभावकों ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि निर्धारित फीस के अलावा अतिरिक्त रकम का बोझ डाला जा रहा है। शिकायत के बावजूद समाधान नहीं होने का दावा भी किया गया है। एक अभिभावक ने बताया कि संस्थान स्तर पर सुनवाई नहीं होने के बाद उन्होंने उपभोक्ता न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।
बड़ा सवाल आखिर कैसे पहुंचते हैं अभिभावकों के नंबर
अब सवाल यह भी है कि आखिर बच्चों और अभिभावकों के मोबाइल नंबर संस्थान तक पहुंचते कैसे हैं? क्या स्कूल या अन्य जगहों से लिए गए नंबरों पर अभिभावकों की अनुमति से संपर्क किया जाता है? काउंसलर कितनी बार संपर्क करते हैं? घर तक पहुंचकर एडमिशन के लिए दबाव बनाने की शिकायतों पर संस्थान की क्या नीति है?
और सबसे अहम सवाल—अगर पूरी प्रक्रिया पारदर्शी है, तो फीस, लोन और भुगतान की पूरी जानकारी अभिभावकों के सामने स्पष्ट रूप से क्यों नहीं रखी जाती?
इधर PW विद्यापीठ पाठशाला के रीजनल मैनेजर अभिषेक कुमार ने अभिभावकों के आरोपों को निराधार बताया है। उनका कहना है कि लोन प्रक्रिया शुरू करने से पहले अभिभावकों को इसकी जानकारी दी जाती है और जिन परिवारों की सहमति होती है, उन्हीं के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है। संस्थान ने यह भी कहा कि किसी भी परेशानी के समाधान के लिए निर्धारित प्रक्रिया है और शिकायतों के निपटारे में समय लग सकता है।
मामला केवल संस्थान की सफाई से खत्म होता नहीं दिख रहा
अगर अभिभावकों के आरोप गलत हैं तो लोन एग्रीमेंट, फीस स्ट्रक्चर, OTP की प्रक्रिया और भुगतान का पूरा हिसाब सामने रखकर स्थिति साफ की जा सकती है। वहीं अगर आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि अभिभावकों को वित्तीय दायित्व की पूरी जानकारी और स्पष्ट सहमति किस स्तर पर सुनिश्चित की गई।
40 हजार की फीस और 59 हजार की देनदारी के बीच का अंतर आखिर किस मद में जुड़ा—यह सवाल भी जवाब मांग रहा है।इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच जरूरी है। फीस रसीद से लेकर लोन एग्रीमेंट तक, OTP से लेकर बैंक खाते से हुई कटौती तक—हर दस्तावेज की जांच होने पर ही सच्चाई सामने आएगी।
क्योंकि मामला सिर्फ एडमिशन का नहीं है। मामला अभिभावकों की जेब, उनकी सहमति और उस भरोसे का है, जिसके आधार पर वे अपने बच्चों का भविष्य किसी शिक्षण संस्थान के हाथों में सौंपते हैं।